आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

आईनों से भी मुकर जाना, तुम्हारा काम है

                
                                                         
                            आईनों से भी मुकर जाना, तुम्हारा काम है,
                                                                 
                            
बात कर के साफ़ बहक जाना, तुम्हारा काम है।

हम ने तो दिल रख दिया था सामने एक तीर के,
खींच कर कमान मुसकुराना, तुम्हारा काम है।

पूछते हैं हाल मेरा इस सलीके से वो आज,
जैसे ख़ुद घाव दे कर भूल जाना, तुम्हारा काम है।

कह रहे हैं आज हमसे वो कि 'शाह' साहब सुनो,
हर ख़ता का मोड़ तक़दीर ठहराना, तुम्हारा काम है।

क़त्ल भी करना सलीक़े से सर-ए-बाज़ार-ए-इश्क़,
फिर तमाशा देख कर रोना, तुम्हारा काम है

सामने बैठे रहो और फ़ासला ऐसा रहे,
पास आ कर भी बहुत दूर होना, तुम्हारा काम है।

माँगते हैं दाद वो अपने सऊबतों की कुछ यूँ,
लूट कर दिल को मुतास्सिर होना, तुम्हारा काम है।

ज़हर मीठे लफ़्ज़ के सांचे में ढालते हो मुदाम,
दर्द दे कर भी मसीहा होना, तुम्हारा काम है।

रूह की पाकीज़गी का दावा तो सच है 'नैर',
पर बदन को धूप कह के छुप जाना, तुम्हारा काम है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर