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सोचा कुआं हूँ

                
                                                         
                            मैंने सोंचा कुआँ को कहूँ
                                                                 
                            
गलियों को साफ कर दूं
चौपाल पर बिछे जाजम
हुक्का की आंच बुझ न जाय
सबके सब को फिर दे दू नया रूप
बिडम्बना
कुआँ ने दम तोड़ दिया
गलियां सूनी हो गयी
चौपाल का बुरा हाल
हुक्का पानी अब कहाँ
बिसलरी के आने से
जाजम का जमाना
रहा ही नहीं
फिर प्रतिशोध को ढूढता रहा
वह भी मेरे तेवर से
छुप छुप कर करता रहा बार
बार, बार, हर, बार
मैंने जब जब किया समझौता
वह नए पूर्वाग्रह में
लिपटा नजर आता रहा।

अरविंद कुमार पाठक
नागदा उज्जैन मध्यप्रदेश


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7 वर्ष पहले

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