बहुतों से सुनी वीरों के बलिदान की वीरगाथाएं
पर कुछ कम नहीं रही मेरे भारत की वीरांगनाएँ
जब दौलत और शोहरत लूटने को विदेशी आक्रांता भारत आए
तब किन परिस्थितियों में हँसते हँसते अपने प्राण गवाए
शायद इस बलिदान को हम आम इंसान नहीं सराह पाएँ
कुछ कम नहीं रही मेरे भारत की वीरांगनाएँ
जब रणभूमि में रणबाँकुरे बन जाते युद्धबंदी या प्राण गवाएँ
तब निडर बनकर सामने आई मेरे देश की वीरांगनाएँ
अस्मिता,परिवार की प्रतिष्ठा, संस्कृति और आत्मसम्मान बचाए
जब आत्मसमर्पण के बाद भी, उनके साथ किया जाता था बलात्कार
बेचा जाता था या विजेताओं को दे दिया जाता था उपहार
मृतक को भी नहीं करेंगे माफ, तब मौत का आलिंगन था एक-मात्र उपाय
कुछ कम नहीं रही मेरे भारत की वीरांगनाएँ
अपमान,हिंसा, शारीरिक और मानसिक अत्याचार से बचने के लिए
नहीं था अन्य कोई विकल्प, तब सामूहिक आत्मदाह के मार्ग अपनाए
जिससे आक्रमणकारी शारीरिक रूप से अपवित्र करने का मौका न पाएं
और दासी और पत्नी बनाने के लिए बेचकर न लाभ उठा पाएं
आत्मसमर्पण नहीं, जो मृत्यु से भी था भयानक,
आक्रमणकारियों के विरूद्ध जौहर कर विरोध जताए
कुछ कम नहीं रही मेरे भारत की वीरांगनाएँ
खालसा,अगलासीस, राजपूत, कंपिली,काठी महिलाओं ने जौहर अपनाए
प्रसिद्ध हैं रणथंभौर, चित्तौड़, चंदेरी, ग्वालियर,
जैसलमेर की जौहर करने वाली महिलाएँ
शाका मे, जौहर के पश्चात पुरूषों को भूखे शेरों की तरह टूट जाने
और अधिक भीषण और अंतिम युद्ध करने को प्रेरित करती थी महिलाएं
कुछ कम नहीं रही मेरे भारत की वीरांगनाएँ
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