हे ईश्वर, रख लो मेरा इतना मान
मुझे बना दो जल और उसके विभिन्न रूपों के समान
जल से ही निर्मित है शरीर का अधिक भाग
माना जल है जीवन, पर है एक शिक्षक के भी समान
जल से वैसे भी है हमें बहुत अपनापन और लगाव
अपने को नष्ट करके भी कर पाऊँ जन कल्याण
मुझे बना दो जल और उसके विभिन्न रूपों के समान
बनूँ वर्षा जैसा,बरसूँ गरीब-अमीर, छोटा-बड़ा
जीव-निर्जीव सब पर एक समान
सूखी धरा और प्यासे लोगों को दूँ फिर से जीवन दान
सत्पुरुषों के लिए बनूं शुद्ध, पवित्र और शीतल हिमपात
पर दुष्टों का करूँ बिजली बनकर सर्वनाश
मुझे बना दो जल और उसके विभिन्न रूपों के समान
समुद्र के समान शांत और महान
कोई भी आकर समा जाए मुझ में, दिल हो इतना विशाल
अपने ही जल को वर्षा में बदल कर, करूँ जनकल्याण
आसमान बनकर जल को समां लू और बरसाऊँ
भूमि को दूँ गर्मी से आराम,बादल बनकर धूप से करूँ बचाव
पहाड़ और पत्थरों जैसी मुश्किलों का करके सामना
नदियों और झरनों सा गंतव्य की ओर करता रहूँ प्रस्थान
मुझे बना दो जल और उसके विभिन्न रूपों के समान
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