"गणित और भूगोल की मोहब्बत"
भूगोल-सी तुम, हर नक्शे में बसी,
गणित-सा मैं, बस तुझमें ही हँसी।
तेरी राहों का हर अक्षांश बन जाऊँ,
तेरे हर देशांतर तक संग-संग आऊँ।
तेरी मुस्कान कोई सुंदर समीकरण,
जिसका हर उत्तर हो सिर्फ़ अपनापन।
दूरी चाहे कितनी भी हो जहाँ में,
गणित कहे—घट जाएगी एक पल में।
तू पर्वत-सी अटल, मैं नदी-सा बहता,
तेरे हर मौसम में अपना रंग कहता।
धरती हो तुम, मैं बनूँ आसमान,
साथ लिखें अपना एक नया जहान।
नक्शों में नहीं, दिलों में मिलें रास्ते,
संख्याओं से नहीं, एहसासों से जुड़ें वास्ते।
गणित और भूगोल का ऐसा हो मेल,
हर पल लगे जैसे प्यार का खेल।"
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