उस बेवफ़ा की याद में आंसू निकल गए,
दिल में दबे जो ग़म थे वो ग़ज़लों में ढल गए।
दुनियां ने तो गिराने की कोशिश बहुत करी,
हम थे कि बार बार गिरे फिर सँभल गए।
जिनके लिए ज़माने को दुश्मन बना लिया,
वो फेर कर निगाह हमीं से बदल गए।
वो नफ़रतों की आग लगा के हैं ख़ुश बहुत ,
इस आग को बुझाने में ये हाथ जल गए।
गर चाहिए सुकून मधुर तान छेड़ तू ,
संगीत की धुनों से तो पत्थर पिघल गए।
सारी अकड़ धरी की धरी रह गई कहीं,
मजबूर हो के वक़्त के साँचे में ढल गए।
- अरुण शर्मा
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