सोचना क्या इश्क़ के अंजाम पर,
जान हाज़िर है तुम्हारे नाम पर।
क्या क़यामत हो अगर वो सामने,
दिल तड़पता है तेरे पैग़ाम पर।
ज़ख़्म कैसे भी हों भर जाते हैं सब,
ग़म न कर कुछ इस दिल-ए-नाकाम पर।
फीका फीका सा लगे है चाँद भी,
आ खड़े होते हैं जब वो बाम पर ।
छोड़ कर मुझको गए हो तुम सनम ,
क्या कहें हम गर्दिश-ए-अय्याम पर।
है चमक ऐसी तुम्हारे हुस्न की ,
हो गया धोका सहर का शाम पर।
-- अरुण शर्मा
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