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"वो समझदार बन जाता है "

                
                                                         
                            जिसके अन्तर्मन में कोई,
                                                                 
                            
ना भाव नहीं अभिलाषा है,
जो घुटता है मन ही मन में,
अपने विषाद पी जाता है,
वो समझदार है इस जग में,
जो झूठी हँसी दिखाता है!!

जो सुनता है सबकी बातें,
सच्ची हों या फिर हों मिथ्या,
जो स्वयं विचारों को अपने,
कहते-कहते रुक जाता है,
हाँ समझदार है वो जो,
कठपुतली-सा शीश हिलाता है!!

है आत्मशून्य जिसका जीवन,
जड़वत जीविका चलाता है
जिसका ना कोई उपालंभ,
नाहीं परिवाद दर्शाता है,
वो समझदार है जो सबकुछ,
सहते-सहते मर जाता है!!

हो जाता जिसका हृदय अश्म ,
जिसके अश्रु सूख जाता है,
रह जाता है "समाज " बनकर,
कामना की बलि चढ़ाता है,
वो समझदार कहलाता है,
हाँ समझदार कहलाता है!!

वो बन जाता है अज्ञानी,
जो हक की बातें करता है,
सबकी ना सुनता कभी-कभी,
अपने मन की भी करता है,
इस जग में उसके बड़े -बड़े,
उपनाम कई मिल जाते हैं,
कभी जड़बुद्धि, कभी बेसमझ,
कभी मुर्ख बन जाता है!!
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56 मिनट पहले

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