मेरे पैदा होने से पहले भी
दुनिया थी।
पेड़ थे,
नदियाँ थीं,
लोग हँसते थे,
लोग मरते थे,
आसमान पर उतने ही सितारे थे
जितने आज हैं।
फिर मैं आया।
और अजीब बात ये है
कि मेरे आते ही
मुझे लगने लगा
कि यह दुनिया मेरे बिना अधूरी थी।
मैंने हर चीज़ पर अपना नाम लिखना शुरू कर दिया।
मेरी किताब,
मेरा कमरा,
मेरा शहर,
मेरा धर्म,
मेरा देश,
मेरी मोहब्बत,
मेरा ख़ुदा...
"मेरा"
जैसे पूरी कायनात
मेरी जेब में रखी हुई कोई चीज़ हो।
फिर एक दिन
एक कब्रिस्तान के सामने से गुज़रा।
वहाँ हज़ारों नाम लिखे थे।
हर नाम के नीचे
दो तारीख़ें थीं।
एक जन्म की,
एक मृत्यु की।
और उन दो तारीख़ों के बीच
एक छोटी-सी रेखा।
बस एक रेखा।
मैं देर तक उस रेखा को देखता रहा।
क्योंकि
सारी मोहब्बतें,
सारी नफ़रतें,
सारी सफलताएँ,
सारे सपने,
सारी लड़ाइयाँ,
आख़िरकार उसी रेखा में बदल गई थीं।
उस दिन पहली बार लगा
कि शायद इंसान की सबसे बड़ी ग़लती
मर जाना नहीं है।
शायद उसकी सबसे बड़ी ग़लती
ख़ुद को बहुत ज़्यादा गंभीरता से लेना है।
हम आते हैं,
थोड़ा-सा शोर करते हैं,
कुछ रिश्ते बनाते हैं,
कुछ सपने तोड़ते हैं,
कुछ दिल दुखाते हैं,
कुछ आँसू पीते हैं,
और फिर चले जाते हैं।
जैसे समुद्र की एक लहर
ख़ुद को समुद्र समझ बैठे।
और सबसे बड़ा रहस्य ये नहीं
कि मृत्यु क्या है।
सबसे बड़ा रहस्य तो ये है
कि इस अनंत ब्रह्मांड में
कुछ वर्षों के लिए
मुझे "मैं" होने का भ्रम क्यों दिया गया।
क्यों?
ताकि मैं घर बना सकूँ?
नाम कमा सकूँ?
या इसलिए
कि एक दिन टूटकर समझ सकूँ
कि मैं कभी था ही नहीं...
मैं तो उसी अनाम अस्तित्व की
एक क्षणिक चमक था,
जो मेरे जाने के बाद भी
वैसे ही चमकता रहेगा।
और जब मेरी आख़िरी साँस निकलेगी,
शायद मृत्यु मुझसे यही कहे—
"जिसे तुम पूरी उम्र 'मैं' कहते रहे,
वो कभी था ही नहीं।"
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