आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

शहर की मोहब्बत

                
                                                         
                            गाँव की मिट्टी लिए इक ख़्वाब लेकर आ गया,
                                                                 
                            
मैं तेरे शहर में अपना नसीब लेकर आ गया।

माँ ने रुख़्सत वक़्त बस इतना दुआ में कह दिया,
"नाम रौशन करके आना..." मैं वही ख़्वाब लेकर आ गया।

किताबों के दरमियाँ जब तेरा चेहरा मिल गया,
मेरी तन्हा ज़िंदगी को एक जहाँ मिल गया।

तेरी हँसी को ही मैंने अपना मुक़द्दर मान लिया,
दिल था मेरा, और तुझे बेइन्तहा प्यार कर लिया।

फिर किसी और का हाथ तूने थाम लिया,
एक पल में मेरी दुनिया को वीरान कर दिया।

तूने रिश्ता एक लफ़्ज़ में ख़त्म कर दिया,
मैंने उम्र भर का दर्द अपने नाम कर लिया।

गाँव लौटा तो सभी ने मुस्कुराकर ये कहा,
"पढ़-लिखकर आ गए?" मैं बस ख़ामोश रह गया।

माँ ने चेहरे पर मेरे दर्द पढ़ लिया मगर,
बाप ने समझा कि शायद वक़्त का असर है।

अब न खेतों में सुकून है, न हवाओं में ख़ुशी,
हर तरफ़ तेरी जुदाई का धुआँ बिखरा हुआ है।

अगर कभी मेरे गाँव की तरफ़ गुज़र हो तेरा,
उस पुराने नीम से मेरा पता पूछ लेना।

लोग इतना ही कहेंगे—
"यहीं रहता था एक लड़का कभी...
जो शहर से डिग्री नहीं, टूटा हुआ दिल लेकर लौटा था।"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर