नेति नेति कर वेदों ने भी
जिस ईश्वर के गुण को गया ।।
भूख प्यास से तड़प रहा था
एक कदम भी चला न जाता
वृद्ध भिखारी ,भीषण गर्मी
आकुल मन बरबस घबड़ाता
ऐसे में उस सदय मनुज ने
जी भर भोजन उसे कराया ।
नर में ही नारायण पाया।।
भादो की वह नदी उफनती
दिखा रही थी अपनी सत्ता
जीवन को दे रही चुनौती
जीवन बहता जैसे पत्ता
ऐसे में उस वीर पुरुष ने
खेल जान पर उसे बचाया।
नर में ही नारायण पाया।।
भीड़ भरे उस राज मार्ग से
उठा ले गया उसे दुशासन
चीर हरण का दृश्य भयावह
हाय विधाता कैसा जीवन
दौड़े युवा बचाने उसको
जैसे हो नारायण आया ।
नर में नारायण को पाया ।।
जग के कण कण में है ईश्वर
लेकिन हम पहचान न पाते
कोटि कोटि हैं रूप उसी के
पर मंदिर में शीश झुकाते
अपनी दृष्टि बदल कर देखो
अखिल सृष्टि है उसकी माया ।
नर में नारायण को पाया।।
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