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समाज की चिड़िया

                
                                                         
                            हाँ, हाँ, मैं समाज की चिड़िया हूँ,
                                                                 
                            
हाँ, हाँ, मैं समाज की चिड़िया हूँ।
मैं गगन में ऊँची उड़ान भरना चाहती हूँ,
अंबर की ऊँचाइयों को छूना चाहती हूँ,
और संग अपने, समाज का विकास चाहती हूँ।
हाँ, मैं समाज की चिड़िया हूँ...
समाज कहता है मुझसे—
"पहले तुम स्वयं उड़ना तो सीखो,
परिवार का साथ होना ज़रूरी है,
हमारी बारी तो इसके बाद आती है।"
हाँ, मैं समाज की चिड़िया हूँ...
मैं कहती हूँ इस समाज से—
"तू 'मेरा-तेरा' और परिवार के मोह को छोड़,
पूरे समाज की प्रगति की सोच रख!"
हाँ, मैं समाज की चिड़िया हूँ...
देखो! राष्ट्र को ही अपना समाज मानने वाला,
हर वीर जवान सरहद पर अपना लहू बहा रहा है।
उसका बलिदान समाज की रक्षा और विकास के लिए है,
उसने कभी सिर्फ़ अपने परिवार का स्वार्थ नहीं देखा।
हाँ, मैं समाज की चिड़िया हूँ...
लेकिन आज समाज में रहने वाला—
झूठा, कपटी और बदनाम व्यक्ति ही सत्ता चला रहा है।
फिर भी, मैं एक स्वतंत्र चिड़िया हूँ,
और इस समाज को बदलना चाहती हूँ!
हाँ, मैं समाज की चिड़िया हूँ...
मैं बदलना चाहती हूँ समाज की हर पुरानी नीति,
समाप्त करना चाहती हूँ पक्षपात और भाई-भतीजावाद।
और समाज की हर एक चिड़िया को,
खुले अंबर में साथ लेकर उड़ना चाहती हूँ!
हाँ, हाँ, मैं समाज की चिड़िया हूँ,
हाँ, हाँ, मैं समाज की चिड़िया हूँ।
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2 महीने पहले

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