वो समझते रहे,
हम ख़ामोश हैं...
उन्हें क्या ख़बर,
हमारी ख़ामोशी में भी
सवालों का एक समंदर ज़िंदा है।
हमने तालीम को
इबादत समझकर जिया है,
उसे किसी बेइंसाफ़ निज़ाम की
नज़र नहीं होने देंगे।
याद रखिए...
जब ख़्वाबों से ज़्यादा
सिफ़ारिश की क़ीमत होने लगे,
तो समझ लीजिए,
ज़ख़्मी सिर्फ़ एक नौजवान नहीं होता,
मुल्क का ज़मीर भी लहूलुहान होता है।
हम तख़्त नहीं माँगते,
हम ताज नहीं माँगते,
हम सिर्फ़ इतना चाहते हैं—
मेहनत की पेशानी पर
इंसाफ़ का उजाला रहे।
क्योंकि...
जिस क़ौम के नौजवान
सवाल करना छोड़ दें,
उस क़ौम का मुस्तक़बिल
ख़ामोश हो जाता है।
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