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अब तुम किसी और की हो

                
                                                         
                            कहने को अब भी बहुत कुछ है,
                                                                 
                            
पर कहें कैसे—तुम अब किसी और की हो।
जो बात कभी आँखों से कह देते थे,
आज वही बात दिल में छिपानी पड़ती है।

तुम्हें खोने का दर्द भी अजीब है,
न तुमसे कोई शिकायत कर सकता हूँ,
न तुम्हें अपना कह सकता हूँ।
बस दूर से तुम्हें खुश देखकर,
हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा बिखरता हूँ।

कुछ ख़त अब भी अधूरे पड़े हैं,
कुछ लफ़्ज़ अब भी तुम्हारे नाम हैं,
कुछ ख़्वाबों में तुम आज भी मेरी हो,
मगर हक़ीक़त में—तुम अब किसी और की हो।

काश, वक़्त को वहीं रोक पाता,
जहाँ तुमने पहली बार मेरा हाथ थामा था,
काश, उस पल को उम्र बना पाता,
जहाँ तुम्हारी आँखों में बस मेरा नाम था।

अब तुमसे मिलने की चाह रखूँ भी तो कैसे,
तुम्हारी दुनिया में मेरा कोई ठिकाना नहीं।
तुम्हें भूलने की कोशिश करूँ भी तो कैसे,
दिल ने तुम्हारे सिवा किसी और को जाना नहीं।

कहने को अब भी बहुत कुछ है,
शायद उम्र भर कहता रहूँगा,
मगर कुछ मोहब्बतें मुकम्मल नहीं होतीं,
दिल में दफ़्न होकर भी ज़िंदा रहती हैं।

और मेरी सबसे ख़ामोश मोहब्बत,
आज भी तुम्हें उतना ही चाहती है।
बस फ़र्क़ इतना है—
पहले तुम्हें पाने की दुआ करता था,
अब तुम्हें किसी और के साथ खुश देखने की दुआ करता हूँ।

कहने को अब भी बहुत कुछ है,
पर कहें कैसे—
तुम अब किसी और की हो।
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55 मिनट पहले

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