बुनकर तुम क्या बुनोगे
मशीनों की चुनौती को कैसे स्वीकार करोगे
विकार की तकलीफ झेलोगे
तो न औषधालय के प्रचार का झंडा गाडोगे
पीड़ा से मन व्यथित न हो
तो भक्त तुम साधना के नए आयाम कैसे गढ़ोगे ।
रिक्तता न हो तो
संपन्नता का अहसास को कैसे भरोगे
नोटों की गद्दी साथ हो तो
कौड़ी के मोल को कैसे पहचानोगे
त्रासदियों का मलबा न झकझोरे
तो प्रकृति के उपहार को कैसे पुजोगे
बंजर रेत के दूर तलक फैले रेगिस्तान न हो तो
बगिया के फूल से संसार को कैसे महकाओगे
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X