आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

झूठ जाल फरेब से, जो, ताउम्र

                
                                                         
                            झूठ जाल फरेब से, जो, ताउम्र, ठगते रहे औरों को
                                                                 
                            
खुद को चूना लगता देख, बहुत घबराये।।
हाय हाय कर जो झूठी तसल्लियां देते रहे औरों को
देख, अपने दर, बर्बादी के आसार बहुत घबराये ।।
देख अपनी बर्बादियों का मंज़र वे ही बहुत घबराये
औरों की बर्बादियों पर जो थे बहुत खिलखिलाये।।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर