है, पीर उठे सिर में,देख के वो तश्वीर,
बिगड़ गई हो, जिनसे जनता की तकदीर ।।
थोड़ा थोड़ा करके फोड़ा यूं बढता जाए
कि हर दिल होता जाए अधीर।।
झूठी तकदीर की छांव में खड़े मानव को
देख, हैरान बड़ा हुआ तदबीर।।
सोचा था मिल कर उनसे राहे मंजिल आसान
पर क्या पता निशाने मंजिल भी होगी परेशान।।
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