अंधकार के वासी सूरज ताप न सह पायेंगे
प्रकाश पर्व उस खातिर संताप ही बन जायेंगे।।
हैं संस्कार के खेल बड़े निराले,शीत शहर के
रहवासी,धूप में आते ही सूख सूख से जायेंगे।।
जीवन पथ समतल रहा नहीं,कभी किसी का
ऊबड़-खाबड़ राहों के बाद, सुख के पल आयेंगे।।
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