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तुमसे ही रौनक है

                
                                                         
                            ये आसमां में छाए घने काले बादल
                                                                 
                            
इन उड़ते बादलों को देखकर
कैसे हल्का-प्रफुल्लित हो जाता है मन
बहती हवाएं कानों में गुनगुनाएं
कहती हों तुमसे ही रौनक है इस जहां में
प्रकृति का हर अनुपम सौंदर्य
तुम्हारी निगाहों से ही देखती है दुनियां
तुम्हारे लफ्ज़ों में ही जान पाती हैं
तमाम नई पुरानी संवेदनाएं वर्जनाएं
मुख्य कभी मौन श्रांत कभी उद्वेलित
मन का हर आवेग भला समझता है कौन
इस जहां में एक बस तुम्हारे सिवा
इन नर्म पत्तों पर ठहरी हुई ओस की बूंदें
फूलों की पंखुड़ियां हवा के झोंकों में
लजाती हर पल छूते ही कांपती उंगलियां
तुम्हारा हर कदम चूमते ऐ घांस के गलीचे
मखमली एहसास का आगाज यहीं से हुआ
कपास के सूख कर फूटे फलों से बिखरे
रूई के फाहे निकलकर उड़ते हुए गगन में
पुराने बीते पलों को हरपल याद करते हुए
~अर्द्धचंद्रधारी त्रिपाठी
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2 महीने पहले

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