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मिलना बाकी है

                
                                                         
                            ढलती रातें बुझते दीपक,
                                                                 
                            
दिन का उजाला बाकी है
कहने को सब अपने हैं
जो सचमुच अपना है
उनसे मिलना बाकी है

कुछ देर यहां पर ठहरो
होने वाली है सहर अभी
स्याह अंधेरे छंट जाएंगे
आएंगे खुशियों के पल
उससे मिलना बाकी है

कोई नहीं नफ़रत के काबिल
अब तक थे दुनियां से ग़ाफ़िल
दुनियां के रंग हजारों हैं
उसका कोई रंग नहीं
हर पल संग जो मेरा है
बस उससे मिलना बाकी है
~अर्द्धचंद्रधारी त्रिपाठी
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3 महीने पहले

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