सुख से जो पल भर ना बीते
ऐसा जीवन किस काम का?
जब रात ढले बेचैन हो मन,
शंका दुःख क्षोभ भरा जीवन,
प्रभु प्रेम ना हो मानव तन में,
श्रद्धा भक्ति अनुराग ना हो।
सारा जग बैरी बन कर जब,
छल झूठ द्वेष अरू कपट करे।
स्वजनों का प्रेम नेह करुणा,
निज तन मन की सुधबुध ना हो।
मन में चिंताओं के बादल
नित उमड़ घुमण अवसाद भरें
दुश्चिंताओं से हो व्याकुल,
जीते जी तिल तिल रोज़ मरे।
हर पल जब जीवन के विष का,
हंस कर नित जब रसपान करे,
हे मानव व्यर्थ तेरा जीवन,
क्यूँ मिथ्या तूं अभिमान करे।
खुशियां क्षण भर गर साथ ना दें,
ऐसा जीवन किस काम का?
~अर्द्धचंद्रधारी त्रिपाठी
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