आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

पक्का घर

                
                                                         
                            जब मकड़ियों के बुने जालों में मकड़ियाँ आराम से रहती हुई दिखीं कमरे में।
                                                                 
                            
तो लगा जैसे उन्हें पता ही है कि होली-दीवाली के पहले भला, कौन ही खबर लेने आएगा उनकी कभी यहाँ?
और इन मानसून की ठंडी हवाओं से लाए हुए ये सब धूल और गर्दे
जब खिड़कियों के जंगले, ग्रिल, और किवाड़ पे बैठ जाते हैं, तब तो उन्हें देख वे और भी गहरी नींद में चली जाती हैं।
यूॅं, जैसे घर उनका और भी पक्का सा हो गया।
ना रात की आई तेज बारिश से हिलती- डुलती हैं और ना ही किसी बिजली की कड़कती हुई आवाजों से कभी घबराती हुई दिखतीं !
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर