जब मकड़ियों के बुने जालों में मकड़ियाँ आराम से रहती हुई दिखीं कमरे में।
तो लगा जैसे उन्हें पता ही है कि होली-दीवाली के पहले भला, कौन ही खबर लेने आएगा उनकी कभी यहाँ?
और इन मानसून की ठंडी हवाओं से लाए हुए ये सब धूल और गर्दे
जब खिड़कियों के जंगले, ग्रिल, और किवाड़ पे बैठ जाते हैं, तब तो उन्हें देख वे और भी गहरी नींद में चली जाती हैं।
यूॅं, जैसे घर उनका और भी पक्का सा हो गया।
ना रात की आई तेज बारिश से हिलती- डुलती हैं और ना ही किसी बिजली की कड़कती हुई आवाजों से कभी घबराती हुई दिखतीं !
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X