इंसानी जज़्बातों से जन्म लेती है—
मेरी हर लिखावट की पहली धड़कन,
न किसी शैली का दावा,
न शब्दों के इतिहास का बोझ।
मैंने तो बस वही लिखा,
जो जीवन ने चुपचाप सिखाया,
जो समय ने आँखों के सामने दिखाया,
जो मन ने सच बनकर पाया।
न प्रसिद्धि की प्यास रही,
न किसी प्रमाण की दरकार,
ये शब्द मेरे अपने हैं—
इसलिए इनमें न दिखावे की चमक,
न बनावट का भार।
हो सकता है, मेरी बातें
हर दिल को अच्छी न लगें,
पर एक बात अटल है—
मैं सच लिखता हूँ,
खोखली बकवास नहीं।
क्योंकि शब्दों की असली कीमत
उनकी सजावट में नहीं,
बल्कि उस सच में होती है
जो दिल की राख से उठकर
आत्मा में उजाला भर देता है।
अगर मेरी पंक्तियाँ
किसी एक टूटे हुए मन तक पहुँच जाएँ,
किसी बुझती आँख में
उम्मीद की लौ जगा जाएँ—
तो समझूँगा, मेरा लिखना सार्थक हुआ।
क्योंकि शब्द तभी अमर होते हैं,
जब वे कागज़ पर नहीं,
किसी इंसान के भीतर धड़कते हैं—
और इंसानी जज़्बातों से जन्मा सच
समय से भी लंबी उम्र जीता है
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