मन के किसी कोने में,
आज कुछ चीज़ें टूटती-सी हैं,
ज़हन में विचार डूबते-से हैं,
धड़कनें भी डोलती-सी हैं,
दिलोदिमाग़ कुछ भटके से हैं,
मन की नैया डोलती सी है
भावनाओं के भँवर में,
सबकुछ डूबता-सा है,
छोड़ दिया जिस आँगन को,
उसी में मन टहलता सा क्यूं है?
सूनी-सी इन आँखों में,
सावन बरसता सा क्यों है?
संसार की इस भागदौड़ से,
मन मुँह मोड़ता-सा क्यों है?
सब कुछ पास होते हुए भी,
कुछ खोया-खोया-सा क्यों है?
शायद कुछ रिश्ते छूटकर भी,
मन से कभी नहीं छूटते,
कुछ आँगन पीछे छूटकर भी,
यादों में कभी नहीं टूटते।
कुछ दर्द कहे नहीं जाते,
कुछ आँसू बहाए नहीं जाते,
और कुछ घर ऐसे होते हैं…
जिन्हें छोड़ तो आते हैं,
पर अपने भीतर से
कभी निकाल नहीं पाते।
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