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मैं चाहे कितनी भी टूट जाऊँ

                
                                                         
                            मैं चाहे कितनी भी टूट जाऊँ,
                                                                 
                            
चाहे ज़िंदगी से कितनी भी रूठ जाऊँ।
तेरी तरफ न लौटूँगी साजन,
चाहे मैं कितनी भी घुट जाऊँ।
मैं जी लूँगी अपने हालातों संग,
तुमसे प्यार की कभी मिन्नतें न माँगूँगी।
तुम आबाद रहो,
मैं लक्ष्मणरेखा की यह दहलीज न लाँघूँगी।
गर तुम मेरे बिन मुस्कुराते हो,
मैं तुम्हारे दुख का कारण न बनना चाहूँगी।
मैं कमज़ोर नहीं हूँ यारा,
जितना तुम मुझे समझते हो।
मैं जी लूँगी तुम बिन ही बिना उफ़ किए,
बिना तुमसे कोई शिकवा-शिकायत के।
शिकायतें तो सिर्फ खुद से हैं,
और उस खुदा से भी,
जिसने मेरे हिस्से में बस गम ही दिया।
वफ़ा जहाँ-जहाँ की,
सिर्फ धोखा और खुदगर्जी ही तोहफे में मिली।
मैं अपनी किस्मत का दोष,
तुमको बिल्कुल भी न दूँगी।
चाहे हालात हों कितने भी बुरे,
मैं तुम बिन जी लूँगी।
-अनुराधा कामेंद्र साहनी
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एक घंटा पहले

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