मुझे आवाज़ बनने दो,
मेरी गरज तूफान ला देगी,
खामोश हैं जो,
यकीं है उनको भी हिला देगी।
ज़ुबां बनकर हक़ीक़त की,
हवा का रुख बदल देगी।
जो सदियों से दबे बैठे हैं,
उनमें एक आस जगा देगी,
जो सोए हैं निराशा के अंधेरों में,
उन्हें परवाज़ सिखा देगी।
-अनुराधा कामेंद्र साहनी
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