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अब क्रांति की तैयारी है

                
                                                         
                            छात्रों की गूंज जारी है,
                                                                 
                            
न्याय की अब बारी है।
खामोश है जो इस घड़ी में,
समझो मर गया है वो,
उसकी बची न कोई ज़िम्मेदारी है
साँसों के साथ वो,
सिर्फ एक निर्जीव प्राणी है।

यह तो न्याय की फ़रमाइश है,
भीख नहीं मांगते हम किसी से,
अपना हक़ ही तो माँगा है।
सत्ताधारी से सवाल पूछना,
क्या यही जुर्म हमारा है?

जेन जी हैं हम,
हुंकार हमारी भारी है,
रोक सको तो रोक लो,
अब क्रांति की तैयारी है!
-अनुराधा कामेंद्र साहनी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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