आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मैं झाँसी की रानी

                
                                                         
                            हाँ, मैं झाँसी की रानी हूँ,
                                                                 
                            
व्यंग में ही सही
पर लोग सच कहते हैं
हाँ, मैं झाँसी की रानी हूँ।

सूरज के पहले जग जाती हूँ,
उसे जग की चिंता है
मैं परिवार की चिंता में
उससे पहले उठ जाती हूँ,
हाँ, मैं झाँसी की रानी हूँ।
व्यंग में ही सही,
पर लोग सच कहते हैं
हाँ, मैं झाँसी की रानी हूँ।

किसकी क्या पसंद है
क्या नापसंद है,
सुबह-सवेरे
दो भुजाओं वाली से
मैं अष्ट भुजाओं वाली बन जाती हूँ,
हाँ, मैं झाँसी की रानी हूँ।
व्यंग में ही सही,
पर लोग सच कहते हैं
हाँ, मैं झाँसी की रानी हूँ।

घर और बाहर दोनों युद्ध के मैदान हैं,
कभी अर्जुन की तरह
निराशा में बैठ जाती हूँ
तो कभी
शस्त्र हाथो में ले
युद्ध में जुट जाती हूँ,
हाँ, मैं झाँसी की रानी हूँ।
व्यंग में ही सही
पर लोग सच कहते हैं,
हाँ, मैं झाँसी की रानी हूँ।

भावनाओं को मन में दबा
शिव जी की तरह
दर्द का विष पिए जाती हूँ,
खुद के लिए जीना नहीं जानती
बस यही भूल किए जाती हूँ,
हाँ, मैं झाँसी की रानी हूँ।
व्यंग में ही सही,
पर लोग सच कहते हैं
हाँ, मैं झाँसी की रानी हूँ।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर