ज़िंदगी जो गफलत में थी,
आधी-अधूरी जैसी भी थी,
दो वक्त की रोटी थी,
महत्वाकांक्षाएँ छोटी थीं।
अपनों का साथ था,
दुनियादारी की समझ कहाँ थी,
ठोकरों में भी एक मज़ा था,
आगे बढ़ने की चाह नहीं थी।
चारदीवारी ही दुनिया थी,
भीड़ में जाने की हिम्मत नहीं थी,
पर नियति के खेल निराले थे,
जो रास्ता दिखाया, वो कोसों दूर था।
उसने पंख खोलने को मजबूर किया,
खुला आसमान और नए रंग थे।
मेरे मन के भीतर जो दबी इच्छाएँ थीं,
वे बस एक खुले आसमान की प्रतीक्षा में थीं।
कब, कहाँ, कैसे...
उसे सब पता था, खेल उसी का बिछाया था।
वहीं से मेरी शुरुआत हुई,
सारी दीवारें तोड़, मेरी उड़ान की चाह हुई।
कई बार ऊँचा आसमान मिला,
तो कई बार ओंधे मुँह गिरना भी हुआ।
कई बार खुद से सवाल किए,
हर फैसले पर मन उलझा रहा।
कभी रोशनी के साये में भी अंधेरा था,
तो कभी अंधेरों में उम्मीद की किरण थी।
कुछ अपनों का साथ मिला,
तो कईयों ने हाथ छोड़ अपना रास्ता चुना।
पर इन सबसे अलग,
मेरा कारवाँ आगे बढ़ चला था।
मेहनत की धूप में अब वे बीज खिलने लगे थे,
जो फूलों की कतार में खड़े थे।
ज़िंदगी जो कल तक गफलत में थी,
आज उसे अपना मुकाम मिल चुका था।
अब मेरा नहीं,
बस नियति का लिखा हुआ सफ़र आगे बढ़ चला था।
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