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यह वक्त अलग है।

                
                                                         
                            यह वक़्त अलग है।
                                                                 
                            

मैं हर बीते लम्हे को देखती हूँ,
और जाने क्यों...
थोड़ा डर जाती हूँ।

मुझे पता नहीं
इतनी जल्दी क्यों रहती है।

जैसे स्टेशन पर खड़ी हूँ,
और रेल छूट रही हो।

सामान भी,
और हाथ भी।

दिल और दिमाग़ में
घड़ी की सुइयों जैसी
एक टकराहट चलती रहती है।

घर की सफ़ेद दीवारें हैं।

फर्श पर
कुछ पुराना सामान रखा है।

कई बार लगता है,
यह कमरा
मुझसे ज़्यादा पुराना हो गया है।

घर का दर्पण भी
कई बार बदल चुका है।

और अब...

उसमें दिखने वाला
मेरा चेहरा भी।

रात को सोने से पहले
कुछ पुरानी बातें
बिना आवाज़ दिए चली आती हैं।

जैसे कोई भीड़
बहुत दूर से
मेरा नाम पुकार रही हो।

एक घर...

शायद किसी नदी के किनारे।

न जाने क्यों लगता है,
मैं वहाँ
कभी रह चुकी हूँ।

एक आवाज़ है...

जो बहुत दूर से आती है।

इस शांत कमरे में
उसकी गूँज
सबसे साफ़ सुनाई देती है।

एक परछाई है,

जो हर सपने के साथ
चली आती है।

जैसे सूने घर में
अचानक किसी बर्तन के
गिरने की आवाज़।

फिर...

पुरानी एल्बम खोलती हूँ।

एक-एक तस्वीर
धीरे-धीरे पलटती हूँ।

तब समझ आता है—

वक़्त
सिर्फ़ कैलेंडर में नहीं बदलता।

वह चेहरे भी बदल देता है।

और शायद...

भीतर रहने वाले इंसान को भी।
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2 महीने पहले

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