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सब ठीक ही था।

                
                                                         
                            पाने को कुछ न मिला जिंदगी में, पर खोने का डर भी तो जाता रहा,सिखाया तो बहुत कुछ इस जिंदगी ने, पर ये सबक ज़रा देर से समझ आया।
                                                                 
                            
कभी हर बात पर सवाल थे, हर राह पर अपनी ही निशानदेही थी,एक लंबी सूची थी जो पाना था, पर वो हसरत अधूरी ही रही।
हँसी खो गई, रोने के बहाने बढ़े, सब कुछ खाली और नीरस लगने लगा,पर जब हाथों में कुछ न रहा, तब इन खाली हाथों का असली मतलब समझ आया।
समझ आया कि ये खाली हाथ तो नए रंगों को समेटने के लिए थे,वो रंग जिन्हें हम बाहर ढूंढ रहे थे, वो तो हमारे ही भीतर छिपे थे।
कितना वक्त गँवा दिया हमने उस चीज़ की झूठी ख्वाहिश में,जो पल सामने था उसे जी न सके, जो पास था उसे कभी सही न माना।
कभी सूची बनाई, कभी ख्वाहिशों को निकाला, इस फेर में जीवन को कितना टाला,अब फिर से एक नया मौका चुनेंगे, खुद की जिंदगी में खुद को ही रखेंगे ।
शिकवे-शिकायतों का दौर अब खत्म हुआ,अब जो जैसा भी है, हम मुस्कुराकर... सब सही ही कहेंगे।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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