रास्ते मुश्किल थे मगर, पैरों ने रुकने से इनकार कर दिया,हर राह पर खुद को पाया, हर आहट ने मेरा ही दीदार किया।
वो एक शोर था भीतर मेरे, जो मुझे हर पल जगाए रखता था,सीमाओं की हर ज़ंजीर को तोड़, आगे बढ़ने का हौसला देता था।
मैं उड़ान भरती आसमान की तरफ, पर जिंदगी हर बार मुझे नीचे ले आती,हराती मुझे हर मोड़ पर, और मुस्कुराकर एक नया सबक सिखाती।
वो कहती—अभी अभ्यास बाकी है, वक्त के दायरों में खुद को मत बाँधो,खुद को मुसाफिर बनाए रखो सीखने का, औरों को देखकर राह मत बदलो।
बिखरने दो खुद को, गिरने दो, फिर ज़माने से लड़कर संभलने दो,एक वक्त ऐसा भी आएगा ऐ राही, जब तुम खुद के हौसले से उठ जाओगे।
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