तुम्हारा नाम अब मेरी उँगलियों को याद नहीं है,
पर जब भी कोई अजनबी तुम्हारे शहर का ज़िक्र करता है...
मेरे भीतर कुछ... बहुत धीरे से टूट जाता है।
मैं अब भी कोशिश करती हूँ पुरानी बातों को भूलने की,
पर तभी, अपना ही लिखा हुआ कुछ याद आ जाता है।
तुम तुम्हारे बारे में ज़्यादा कुछ लिखा नहीं,
ना कभी ज़िक्र किया,
बस मन के भीतर किसी शांत कोने में,
कुछ यादें संदूकों में संभाल कर रखी हैं।
सोचा था... तुम वापस आओगे तो मैं ये तुम्हें लौटाऊँगी,
मन के भीतर चल रहे अधूरे गीतों को
संग गुनगुनाऊँगी।
बहुत सारे सवाल थे जो तुमसे पूछने बाक़ी थे,
पर पता है... हाँ, तुम जवाब नहीं दोगे।
अपने ''अहम 'को थोड़ा किनारे रख कर ,
तुम कभी मुझसे मिलने नहीं आओगे।
बस... बीच-बीच में तुम्हारा एक मैसेज आ जाता है,
तुम क्या सोचकर याद करते हो, मुझे पता नहीं।
बहुत कोशिश की... कि बैठूँ कभी साथ तुम्हारे,
बहुत सारी तुम्हारी बातें सुनूँ और तुम्हारी खामोशी को पढ़ूँ।
पर वक़्त को न जाने कुछ और ही मंज़ूर था,
जबकि कई इबादतों में सिर्फ़ तुम्हें ही माँगा था।
शायद...
ईश्वर भी मेरी फ़रियाद
रोज़ सुनते-सुनते थक गए होंगे।
मुझे ऐसा ही लगता था।
पर मुझे लगा था सब ठीक हो जाएगा, एक वक़्त के बाद हम एक हो जाएँगे,
किसकी ग़लती थी किसकी नहीं... उससे बहुत आगे बढ़ जाएँगे।
पर तुम? तुम तो तुम ठहरे!
तुम्हें अपनी राहें अलग करनी थीं,
किसी अलग मंज़िल पर अकेले ही चलना था।
आशा करती हूँ, तुम जहाँ भी हो, खुश रहो,
ईश्वर से बस यही दुआ करती हूँ, तुम्हारी सलामती माँगती हूँ।
कोई बात नहीं... जो भी था, वह वक़्त भी सही था,
उसे याद कर आज भी चेहरे पर एक मुस्कुराहट आ जाती है।
हाँ, कभी-कभी तुम्हारी याद भी आ जाती है,
पर अब ईश्वर से सिर्फ़ यही माँगती हूँ...
कि वह याद अब धीरे-धीरे धुंधली पड़ जाए,
तुम्हारा चेहरा मेरे दिल-ओ-दिमाग़ से पूरी तरह हट जाए।
क्योंकि अब... मैं फिर से प्यार को तलाश रही हूँ,
अपने भीतर नई उम्मीदों को जगा रही हूँ।
अब शायद वो पुरानी ग़लतियाँ दोबारा ना होंगी,
मैं अपनी डायरी के एक नए पन्ने पर,
एक नई कहानी लिखूँगी...
और अब वहाँ, नाम लिखने की जल्दी नहीं होगी।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X