अभी-अभी
दरवाज़े पर दस्तक हुई,
जाकर देखा तो
बाहर का मौसम ख़राब था।
पर यह दस्तक
मौसम ख़राब होने की थी,
या असल में
कोई दरवाज़े पर था?
हल्की हवाओं के साथ
बारिश का मौसम लग रहा था।
तभी माँ ने अंदर से आवाज़ लगाई—
“बाहर से कपड़े उठा लो।”
एक पल को लगा,
जैसे बारिश में
एक बार तो भीग लूँ।
पर बारिश हो कहाँ रही थी?
अंदर चारों तरफ़
सामान फैला हुआ था।
क्या कुछ है
जो सफ़ाई चल रही है?
घर के पर्दे निकले हुए थे,
घर के बर्तन निकले हुए थे।
फिर से उन्हें
सलीके से लगाया जा रहा था।
तभी पापा की आवाज़ आई—
“जो सामान नहीं चाहिए,
वह फेंक देना।”
फेंक देना—
वह क्या होता है?
दस्तक वाली बात
अब गायब थी।
पापा की टिप्पणियाँ चल रही थीं
और मम्मी का गुस्सा दिख रहा था।
पीली चादर,
नीली चादर पर बहस हो रही थी।
घर के फ़र्नीचर को भी
बदलने की बात हो रही थी।
तभी एक शांति-सी फैली,
जैसे कुछ बिखर रहा हो।
गैस पर आज दाल बन रही थी
और एक तरफ़ चावल।
तभी उस शांति को
चीरती हुई एक आवाज़ आई—
“यह सामान मैं ले जाऊँ,
मेरे काम आ जाएगा।”
घर में जितनी जगह बन रही थी,
उतना ही पुराना सामान
रखा जा रहा था।
पुराने कपड़े,
पुराने बर्तन...
हम भी तो
पुराने ही हो गए हैं।
कहीं से हड्डियाँ जवाब दे रही हैं,
कहीं से चेहरे की झुर्रियाँ दिख रही हैं।
अब घर और इंसानों के बीच
यह पता लगाना मुश्किल है
कि कौन किससे बड़ा है।
इन्हीं सबके बीच लगा—
बस, अब हो गया।
कल का कल देखेंगे।
पर देखना क्या है—
काम
या जो वो दरवाज़े पर था?
अब सुबह का मौसम
छँट रहा था।
बाहर ऐसा लग रहा था
जैसे किसी ने काले रंग से
कोई सुंदर आकृति बनाई हो।
बीच में
सफ़ेद रंग की बिंदी।
अब तो अड़ोसी-पड़ोसी के घर भी
दिखने बंद हो गए थे।
एक धीमी-सी ध्वनि चल रही थी,
जैसे उसको
मेरा पसंदीदा संगीत पता हो।
एक-एक करके
सब उधर से
सामानों की तरह खिसक रहे थे।
तभी दरवाज़े पर
फिर से दस्तक हुई।
क्या सुबह वाला
फिर से कोई आया है?
या कोई अनजान
इस घर का पता
ढूँढ रहा है?
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