क्या तुम आओगी मुझसे मिलने...?
जब बारिश होगी, जब फूल खिलेंगे
जब काले बादल छाएंगे, गरजेंगे, बरसेंगे
तब...क्या तुम आओगी मुझसे मिलने..??
जब सूखे-ठूंठ पहाड़ों पर हरियाली छा जाएगी,
जब दूर कहीं पेड़ पर बैठी कोयल गीत सुनाएगी,
जब जंगल में गूंज उठेगा कल-कल बहते झरनों का शोर,
जब तपती धरती को तृप्ति मिलेगी, बूंदों संग नाचेंगे मोर,
तब...क्या तुम आओगी मुझसे मिलने..??
जब खेतों में भीगी औरतें धान रोपतीं गीत मिलन के गाएंगी,
जब काठ हो चुके पेड़ हरियाएंगे और उन पर चिड़िया इठलाएंगी,
जब साँझ ढले धुंआ चूल्हे का गांव को अपने आगोश में लेगा,
जब पगडंडियों पर बिछलेंगे पांव और मिट्टी का सोंधापन महकेगा,
तब...क्या तुम आओगी मुझसे मिलने..??
देखो, बादल इस मौसम में नहीं भूलते कैसे धरती पर छा जाते हैं,
देखो, किनारे इस मौसम में नहीं भूलते कैसे लहरों में समा जाते हैं,
देखो, खग-विहग इस मौसम में नहीं भूलते कैसे गीत प्रेम के गाते हैं,
देखो, राग भी इस मौसम में नहीं भूलते कैसे रागिनियों से मिल जाते हैं
तो उम्मीद करता हूँ मैं एकाकी, तुम भी ना भूलोगी अबकी
प्रकृति की तरह सजोगी-संवरोगी और मुझसे मिलने आओगी इस मौसम में..
इस भीगे-भीगे मौसम में...।
- अनुपम निशान्त
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