आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

वो माँ बाप ही होते हैं

                
                                                         
                            जो तेरे जज्बातों को जुबान पर आने से पहले ही जान जाते हैं,
                                                                 
                            
वो माँ बाप ही होते हैं जो तेरे चेहरे से तेरी परेशानी को पहचान जाते हैं.

तेरी खातिर सोलह सोमवार व्रत रहते, उदास ग़र तू हो तो वो भी खुश रह पाते कहाँ है,
मौका मिले तो तलाशना उनके कपड़े कभी कि वो अपनी परेशानियाँ तुझसे छुपाते कहाँ हैं.

तेरी जरा सी तबीयत खराब होने पर जो भगवान से भी लड़ जाते हैं,
वो माँ बाप ही होते हैं जो अपनी जरूरतें रोककर तेरी ख्वाहिशों को मुकम्मल बनाते हैं,

इसीलिए कहते हैं कि

मुमकिन कहाँ है शब्दों में बयां करना माता पिता की अच्छाई को,
ये तो वो शख्स हैं जो पीछे छोड़ दे
खुदा की खुदाई को...!!


Anubhav Mishra  

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
 
6 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर