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रोज़गार का संघर्ष

                
                                                         
                            कोई शख़्स है जो रात को भी है जगा हुआ,
                                                                 
                            
कोई शख़्स है जो धूप में भी है खड़ा हुआ।
कोई शख़्स है जो चाह के भी जी नहीं रहा,
कोई शख़्स है जो ज़ख्म को भी सी नहीं रहा।
एक हम हैं जो कहीं बैठ के ये सोच रहे हैं,
कि युद्ध है ज़्यादा जहाँ वहाँ पहुंचे नहीं है।
हर रोज़ मन में हार और जीत रहे हैं,
किया नहीं जो आज तक वो सीख रहे हैं।
कुछ है जो मन में हम अभी नकार रहे हैं,
थोड़ा जीत रहे हैं, ज़्यादा हार रहे हैं।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

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