आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

इस कष्ट से ही रात को मैं सो नहीं सकूँ

                
                                                         
                            एक मन है मेरा मैं जिसे समझा नहीं सकूँ,
                                                                 
                            
आदत है कैसी मैं जिसे भुला नहीं सकूँ।

मैं जानता हूँ क्या है सही और क्या गलत,
पर इस जहाँ को मैं कभी पहचान ना सकूँ।

मैं जानता हूँ इस समय उलझा सा हुआ हूँ,
पर जान के भी मैं इसे सुलझा नहीं सकूँ।

ऐसा नहीं कि मैं कभी कोशिश नहीं करूँ,
इस कष्ट से ही रात को मैं सो नहीं सकूँ
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर