कश्मकश-ए-ज़िन्दगी है और क्या
जिसमें थोड़ी सी खुशी है और क्या
कोशिशें नाक़ाम मेरी हो रहीं
रास्तों की बेरुख़ी है और क्या
रास्ता तकता रहा ये सोचकर
तू इधर से आ रही है और क्या
ज़िन्दगी इक ख़्वाब के मानिंद है
फिर भी जीने की पड़ी है और क्या
इश्क़ करने का मज़ा कुछ दिन ही है
फिर तो इसमें बेबसी है और क्या
बन्द करके अपनी आँखें देर तक
वो मुझे ही देखती है और क्या ।
-अंशु जैन 'आँसू'
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