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तालीम अब व्यापार है

                
                                                         
                            तालीम अब व्यापार है,
                                                                 
                            
हर ओर बस बाज़ार है।

कॉलेजों में भीड़ है,
छत्ता-सा हर द्वार है।

डिग्री लेकर क्या करें,
रोज़गार लाचार है।

फीसों का ही खेल है,
ज्ञान क्यों बीमार है?

भाषणों में तालीम है,
जेबों में व्यापार है।

ऊँची-ऊँची इमारतें,
खाली हर किरदार है।

'समर' सच बोलिए,
इल्म क्यों शर्मसार है?
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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