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मुर्दों के दुश्मन

                
                                                         
                            मुझे बड़ी शिकायत थी—
                                                                 
                            
जिंदगी से
एक दिन
घूमते-घूमते
कब्रिस्तान जा पहुँचा
वहां कुछ लोग
जुआ खेल रहे थे
कुछ गांजा पी रहे थे
कुछ बेहोशी की हालत में आलाप कर रहे थे
मै भी वहीं ठहर गया;
देखा कि मेरे परिचय के
बूढ़े दादा बैठ कर चिलम का कश खींच रहे थे
मैने पूछा-
आपको लोगों से कोई शिकायत,
क्यों नहीं होती?
आप जहाँ रहते है, आपको दो रोटी भी
नहीं मिलती
उनकी इतनी चापलूसी क्यों?
उन्होंने कहा—
बेटा
जलन, धोखा धड़ी, और लूट
ये सब तो जिंदा लोगों के चोंचले है
हम मुर्दों का
कोई दुश्मन नहीं होता l
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एक घंटा पहले

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