आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

प्रेम का गीत

                
                                                         
                            जिसे देख मेरा दिल बावरा बन रहा,
                                                                 
                            
वो मुझे देख मुस्कुराते चलती बनी।

जिसे देख ये “रवि” भी शर्माने लगा,
वो मुझे देख शर्माते चलती बनी।

ये दिल फिर भी पागल बना फिरता है,
उससे मिलने को और बतियाने को।

मेरे अरमानों को मुस्कुराकर कुचलते हुए,
वो मुझे शादी का आमंत्रण देकर चलती बनी।

वो, “मुझसे फिर मिलूँगी” बोलकर चलती बनी।

-रविकुमार खोब्रागड़े 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर