"काली बादल छाई, अब सावन आई है"
आसमान में काले बादल छाई,
बरखा ने फिर धूम मचाई ...
पंछियों के बनाए उन घोंसलों की,
जो मेहनत से तिनका-तिनका जोड़ बनाए,
आँधी-तूफ़ानों से अब
मुठभेड़ करने की बारी आई है।
अब परिणाम देखने की बारी आई है...
काली बादल छाई, अब सावन आई है... ॥१॥
पेड़-पौधों में जैसे हो वार्तालाप,
कितना जल सोखना है,
कितना धरती में छोड़ना है,
पंछियों की मेहनत ने,
किसानों की फसलों ने,
आज फिर अपनी रंगत दिखाई है।
पंछी गीत गाएँ, किसान मुस्कुराएँ,
दोनों के संघर्ष ने रंग लाई है...
काली बादल छाई, अब सावन आई है... ॥२॥
बच्चों का मन ललचाए
बारिश में बाहर जाने को,
अब बहते पानी में काग़ज़ की
नाव बहाने की बारी आई है।
बचपन की कोई भूली-बिसरी याद
घर के मुखिया को फिर आई है।
वही बारिश, वही आँगन,
वही बचपन की परछाई है...
काली बादल छाई, अब सावन आई है...ll ३ll
किसानों को खेतों में जाने की जल्दी,
बच्चों को स्कूल से घर आने की जल्दी।
काले बादलों ने सबके मन में
थोड़ी-सी घबराहट भी जगाई है।
फिर दोस्तों के संग बैठकर
गरम चाय की चुस्की लगाने की बारी आई है।
बारिश की बूंदों ने जैसे
हर चेहरे पर मुस्कान सजाई है...
काली बादल छाई, अब सावन आई है... ॥४॥
-रविकुमार खोब्रागड़े
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