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दौर-ए-मोहब्बत

                
                                                         
                            इक जफ़ा का अब निशाँ बाक़ी रहा।
                                                                 
                            
चहरे में सच का बयाँ बाक़ी रहा

बेहया दौर-ए-मोहब्बत में यहाँ,
लुट गई अस्मत, धुआँ बाक़ी रहा।

सच की बातें जो ज़बाँ पर ले चले,
उनके हिस्से में ज़ियाँ बाक़ी रहा।

बेक़सूरों का बहा जो ख़ूँ यहाँ,
पूछता हर इक मकाँ बाक़ी रहा।

जब कोई भी साथ देने ना उठा,
दर्द का इक कारवाँ बाक़ी रहा।

टूट जाएगा गुरूर-ए-ज़ालिमाँ,
वक़्त का अपना बयाँ बाक़ी रहा।

 
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एक घंटा पहले

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