आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अख़बार अब अख़बार न रहा!

                
                                                         
                            अख़बार अब अख़बार न रहा, सच का वह अधिकार न रहा,
                                                                 
                            
स्याही बिकने लगी जहाँ से, शब्दों में वह अब धार न रहा।

सुबह-सुबह जो घर-घर पहुँचे, जागृति का संदेश लिए,
अब हर पन्ना पूछ रहा है, क्यों निष्पक्ष विचार न रहा।

शीर्षक ऊँचे, शोर बहुत है, भीतर लेकिन सन्नाटा है,
सत्य दबा विज्ञापनों में, जनता का अख़बार न रहा।

फिर लौट आई है वही राजतंत्र की हुकूमत,
लोकतांत्रिक देश में लोकतंत्र पर विश्वास न रहा।

सच की आवाज़ दब गई सत्ता के शोर तले,
अब आईनों को भी अपने ही प्रतिबिंब का अहसास न रहा।

"अख़बार अब अख़बार न रहा"
- रविकुमार खोब्रागड़े


 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर