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ओ ! अभागी बेटियॉं

                
                                                         
                            ओ ! अभागी बेटियाँ ,
                                                                 
                            
क्या तेरे है भाग्य मे!
सौभाग्य की तो तू प्रतिक,
फिर अभाग्य क्यो तेरे भाग्य मे ?
माँ की ममता के आँचल मे,
पिता की शीतल छाँव मे,
तू तो नाजो से पली
बाग के इक फूल सी।
तब तू न तौली गयी ,
गुणता की तराजू मे ।
अवगुण तुझ मे तब थी नही !
ये तो हो सकता ही नही।
माँ कहती थी "भागोवाली",
पिता कहते थे "राजदुलारी"।
ओ ! अभागी बेटियाँ ,
क्या तेरे है भाग्य मे !
चक्र समय का बदला ऐसा,
जैसे पलके झपकी हो ऑंखो ने !
परिणय सूत मे तू बँधी,
मात-पिता तेरे हूए निहाल।
जमा की हुई ,हर पुँजी जोड़कर।
देना चाहा तुझे "भाग्य-सौभाग्य "।
पर समय चक्र से ,बच सका है कौन !
जो मारा हो स्वंय के भाग्य से,
वो सौभाग्यवान हो सका कहा है !
सौंपी गई वो जिस हाथ मे,
मान के जीवन भर का रक्षक।
वो रक्षक स्वंय, जो भक्षक बना।
आस्तीन के सांप सा।
इससे अभाग्य क्या हो सकता है?
उस सौभाग्यवती के भाग्य का !
ओ ! अभागी बेटियाँ,
क्या तेरे है भाग्य मे !


 
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3 महीने पहले

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