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काश मनुष्य में संवेदनाएं न होती

                
                                                         
                            काश मनुष्य में संवेदनाएं न होती
                                                                 
                            
हम भी मशीन की तरह होते
न होता दर्द
न चुभती बातें
न रूलाती यादें
बस एक पत्थर की तरह होते
न पहुंचती चोट
न होती पीड़ा
या फिर एक पंछी होते
जब जहां चाहे
निकल जाते, बेड़ियां तोड़
खुले आसमां की ओर
हम विचार होते
जो जब चाहे
कही भी आ -जा सकते
जब चाहे
बदल सकते
या फिर कल्पना होते
जिससे..जो पा न सके
उससे मिलन होता..
जिस पर कोई बंदिश न होती..
काश मनुष्य में संवेदनाएं ही ना होती..
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3 घंटे पहले

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