रात भर तेज़ हवा चलती रही
और एक शम्मा थी ठिठुरती रही
हवा के झोंके डराते रहे शब भर उसको
अपने सितम से दबाते रहे शब भर उसको
कभी डर कर वो मध्यम सी हो जाती थी
फिर नए दम से वापस से वो जल जाती थी
बहुत आसान था डरकर के उसका बुझ जाना
उन हवाओं के सितम के आगे झुक जाना
मगर वो लड़ती रही अपने पूरे दम से
मेरी भी आँख थी भर आई उसके ग़म से
मगर वो करती भी क्या हो गई बेबस आख़िर
लड़ते-लड़ते वो वहीं हो गई बेहिस आख़िर
आख़िर उन तेज़ हवाओं से उसे घेर लिया
और उस शम्मा ने मुझसे नज़र फेर लिया
(बेहिस: अचेत/सुन्न हो जाना)
मैंने डर और फिर हिम्मत का फासला देखा
एक नन्हीं सी उस शम्मा का हौसला देखा।
-अनमोल
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