पुरानी डायरी से झाँक कर बुला रही है मुझे
वो एक नज़्म पुरानी सता रही है मुझे
जाने क्यों पर मैं उसे खोलना नहीं चाहता
मैं उसके बारे में कुछ बोलना नहीं चाहता
न जाने कौन सी तस्वीरें दफ़न हैं वहां
न जाने कौन सी तहरीरें दफ़न हैं वहां
न जाने कौन सा माज़ी मुझे दिखाएगी
न जाने कौन से किस्से वो दोहराएगी
न जाने कैसे सवालात दफ़्न होंगे वहां
न जाने कौन से हालात दफ़्न होंगे वहां
मुझे उस नज़्म का उन्वान भी अब याद नहीं
उसमें छुपे हुए बयान भी अब याद नहीं
न जाने कौन सा पिटारा खोल देगी वो
राज़ कौन सा हमारा खोल देगी वो
न जाने कौन सी गलियों में वो ले जायेगी
न जाने कैसे रास्तों पे वो चलायेगी
अब उन रास्तों पे चलने का मन नहीं मेरा
हां उस नज़्म को पढ़ने का मन नहीं मेरा।
-अनमोल
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X