आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

जिन ख्वाबों की कसक दिल में

                
                                                         
                            काश एक ऐसा लफ्ज़ है
                                                                 
                            
जिसके ज़ुबाँ पर आते ही
न जाने कितने ही रंग-बिरंगे
ख़्वाब ज़हन में आ जाते हैं
दिल के खाली आसमान पर
इन्द्रधनुष से छा जाते हैं

जिन ख्वाबों की कसक दिल में
दबी बड़ी है बरसों से
जिन ख्वाबों की महक दिल में
दबी पड़ी है बरसों से
जिनको देखने की अब शायद
दिल में बची नहीं हिम्मत
ज़हन भी शायद इनको लाने की
जुटा न पाया हो हिम्मत
ऐसे में एक काश दबे पाओं आकर
खोल देता है वो पिटारी
जिसमें सारे ख़्वाब दफ़्न हैं।
-अनमोल
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर